वी वीआईपी मूवमेंट…जय हो!

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(फ़ाइल फ़ोटो)

2014 में सलमान खान अभिनीत हिंदी फिल्म जय हो आयी थी जिसमें आमजन को वीआईपी मूवमेंट के चलते होने वाली परेशानियों का तथा इससे व्यवस्था के खिलाफ उपजने वाले आक्रोश का चित्रण किया गया था। हालांकि इस सामान्य सी मसाला फ़िल्म को हिट बनाने फ़िल्म के नायक को सुपर हीरो की भांति पेश किया गया।बहरहाल फ़िल्म अपनी पटकथा के मुताबिक दर्शकों पर कितनी छाप छोड़ी यह चर्चा का विषय यहां पर नहीं है लेकिन जनता के सेवक कहे जाने वाले जनप्रतिनिधि जोकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने जाने पश्चात संवैधानिक पदों पर आसीन होते ही आम से ख़ास हो जाते हैं यह अवश्य बहस का मुद्दा है।आम से ख़ास में शामिल होने के बाद सुरक्षा एवं अन्य दृष्टि से प्रशासनिक व्यवस्था अंतर्गत स्पेशल ट्रीटमेंट जोकि कहीं न कहीं आमजन के लिए परेशानी का सबब ही होता है लोकतांत्रिक व्यवस्था का बदनुमा दाग है।

सूबे के मुखिया का हालिया रायगढ़ आगमन पिछले कोरोना काल मे लंबे अर्से के बाद होना एवं जनता के बीच लोकप्रियता बढ़ाने के लिए पार्टी एवं सरकारी जद्दोजहद में अतिउत्साही कदम उठाना जिनमें ट्रेफिक कंट्रोल,मार्ग डायवर्सन,रेहड़ियों,ठेलों को हटाना इत्यादि प्रयोगों ने एकबारगी फ़िर से सिध्द कर दिया कि वीआईपी कल्चर कभी भी समाप्त नहीं होने वाला भले ही सरकार जिस किसी की भी क्यों न हो।

सूबे के मुखिया के काफ़िले के सहज गमन हेतु आमजनों के लिए आवागमन वर्जित किया गया था इन क्षेत्रों में :- 👉1.शहीद चौक, 2. सारंगढ़ चौक, 3. सुभाष चौक, 4. स्टेशन चौक, 5. गांधी प्रतिमा, 6. सत्तीगुढ़ी चौक, 7. गद्दी चौक, 8. गौरी शंकर मंदिर तिराहा, 9. रामपुर तिराहा से सर्किट हाउस मार्ग शाम 3:00 बजे से 7:00 बजे तक आवागमन पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया गया था। वहीं केवड़ाबाड़ी चौक से जूटमिल क्षेत्र जाने वाले लोगों के लिए केवड़ा बाड़ी चौक से सत्तीगुड़ी चौक से हीरापुर चौक होते हुए रेलवे फाटक से नंदेली तिराहा मार्ग का प्रयोग किये जाने की गाइड लाइन जारी की गई थी जिसमें अनावश्यक चार से पांच किलोमीटर दूरी बढ़ने के साथ साथ भारी वाहनों के बीच धूल खाना आमजनों के हिस्से आया था ।

मोदी सरकार ने इसी वीआईपी कल्चर को समाप्त करने लालबत्ती हटाई थी फिर भी एक वाकये ने छत्तीसगढ़ में भाजपा की तत्कालीन सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह की काफी किरकिरी करवाई थी। रमनसिंह के बेटे अभिषेक की पत्नी ऐश्वर्या की डिलीवरी के लिए उन्हें रायपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल में भर्ती कराया गया लेकिन वीआईपी मूवमेंट के तहत डिलीवरी के लिए पूरे सेकंड फ्लोर को खाली कराया गया और मरीजों को दूसरी जगह शिफ्ट होने को कहा।
सीएम की बहू को स्पेशल वार्ड में भर्ती कराया जबकि तीन अलग केबिन को सिक्यॉरिटी पर्सनल के लिए बुक किया गया। यहीं नहीं बीमार डॉक्टरों के कमरे को भी पुलिस कंट्रोल रूम में तब्दील कर दिया गया। वहीं आम मरीजों को जो पहले से वहां भर्ती थे उन्हें पहली मंजिल के लेबर वॉर्ड में भर्ती किया गया. इस दौरान कई गर्भवती महिलाओं को एक ही बेड साझा करना पड़ा। दूसरे मरीजों को भी काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा।ऐसे अनेकों उदाहरण हमें वीआईपी मूवमेंट के दौरान देखने मिलते हैं फिर भी इसे ख़त्म करने के सार्थक प्रयास आज तक नहीं हुए।इस परंपरा के पीछे आज भी हमारी गुलाम मानसिकता एवं मानवीय स्वभाव एक बड़ी वजह हो सकती है लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बीत जाने के बाद भी इस परिपाटी की उत्तरोत्तर बढ़ोतरी किसी भी लोकतंत्र के लिए मुनासिब नहीं है।लोकतंत्र में चुने हुए जनप्रतिनिधियों को उनके पदों के अनुसार सम्मान मिलना कोई अनुचित बात नहीं है लेकिन कभी कभी सत्ताधीशों के नजरों में चढ़ने के लिए प्रोटोकॉल के नाम पर किये जाने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के अविवेकपूर्ण व्यवहार से जनता के बीच सत्ताधारियों की छवि खराब ही होती है जिसका खामियाजा उन्हें भविष्य में चुनाव के दौरान भुगतना पड़ता है

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